यूपी में भाजपा अपनी उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी। पिछली बार 62 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार 33 पर सिमट गई। सेंट्रल यूपी में उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। भाजपा ने राममंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और निर्माण को जिस तरह से जनता से बीच उठाया, उसका फायदा उसे नहीं मिला। राममंदिर के इर्द-गिर्द की सभी लोकसभा सीटें भाजपा हार गई। अयोध्या मंडल में उसका रिपोर्ट कार्ड ''जीरो'' रहा।
फैजाबाद सीट से सांसद लल्लू सिंह ने जीत सके
इतना ही नहीं वर्ष 2019 के चुनाव में भाजपा ने मध्य यूपी की 24 में से 22 सीटें जीती थीं। लेकिन, इस बार उसे इस क्षेत्र में 13 सीटों का नुकसान हुआ। वहीं, कांग्रेस को 3 और सपा को 11 सीटों का फायदा हुआ। अयोध्या मंडल की फैजाबाद सीट भी भाजपा नहीं बचा सकी। सपा ने अयोध्या में दलित प्रत्याशी व पूर्व मंत्री अवधेश प्रसाद को उतारा, जिन्होंने भाजपा के लल्लू सिंह को 50 हजार से ज्यादा मतों से पराजित किया। इस मंडल की सबसे चर्चित सीट अमेठी में भाजपा प्रत्याशी व कद्दावर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी कांग्रेस के केएल शर्मा के सामने कहीं भी नहीं टिक सकीं।
बाराबंकी में कांग्रेस के तनुज पुनिया दो लाख वोटों से जीते
बाराबंकी में कांग्रेस के तनुज पुनिया ने दो लाख से ज्यादा मतों से भाजपा प्रत्याशी राजरानी रावत को हराकर साबित कर दिया कि मंदिर से उपजी किसी तरह की लहर यहां तक नहीं पहुंच सकी। अयोध्या मंडल के अम्बेडकरनगर क्षेत्र में पिछली बार बसपा के टिकट पर सांसद चुने गए रितेश पांडे पर भाजपा ने इस बार दांव लगाया था। उसका यह दांव भी फ्लॉप साबित हुआ। सपा के लालजी वर्मा ने उन पर बढ़त ली।
लोकसभा चुनाव 2024 को मंगलवार को जारी परिणाम में भारतीय जनता पार्टी ने एनडीए के साथ 292 सीटें जीतने में कामयाब हुई है. एनडीए को इस बार 63 सीटों का नुकसान हुआ है। जबकि इंडी गठबंधन खाते में 243 सीटें आई हैं। जबकि 2019 में सिर्फ 91 सीटें मिली थीं। इस तरह इंडी गठबंधन को 143 सीटों का फायदा हुआ है। जबकि अन्य को इस बार 99 सीटें मिली हैं। लोकसभा चुनाव के पहले से सात चरणों में मतदान क्रमशः 66.14 प्रतिशत, 66.71 प्रतिशत, 65.68 प्रतिशत, 69.16 प्रतिशत, 62.2 प्रतिशत और 63.36, 62.36 रहा। इस बार पूरे चुनाव अभियान के दौरान भाजपा, कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों के एजेंडे में संविधान और मुस्लिम वोटर रहे।
मुस्लिम आरक्षण और संविधान के मुद्दे ने भाजपा को लगाया डेंट
चुनाव के दौरान मुस्लिम आरक्षण और संविधान के मुद्दे पर पार्टियों में जुबानी जंग देखने को मिली। भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सत्ता में आई तो एससी-एसटी का आरक्षण छीनकर मुस्लिमों को दे दिया जाएगा। वहीं, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा सत्ता में आई तो संविधान बदल दिया जाएगा और एससी-एसटी का आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा।इन सब दावों के बीच चुनाव परिणाम में जो देखने को मिला, उससे काफी हद तक यह साफ हो गया कि भाजपा का एससी-एसटी का आरक्षण छीनकर मुस्लिमों को देने का आरोप कुछ रास नहीं आया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा को मुस्लिम बहुल लोकसभा सीटों में से 30 फीसदी सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी को पिछले बार के मुकाबले तीन गुना से ज्यादा सीट का फायदा हुआ।
स्थानीय मुद्दे रहे हावी, कोताही की चुकानी पड़ी कीमत
प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के बावजूद उम्मीदवारों के चयन और चुनावी मुद्दों को सेट करने में विफलता लोकसभा चुनाव में भाजपा पर भारी पड़ी। कुछ राज्यों में बड़े नेताओं के अहं का टकराव भी नतीजों पर नकारात्मक असर पड़ा। चुनाव नतीजों से साफ है कि 2014 और 2019 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले यूपी में अपने ओबीसी वोट बैंक को सहेजने में विफल रही।बावजूद उम्मीदवारों के चयन और चुनावी मुद्दों को सेट करने में विफलता लोकसभा चुनाव में भाजपा पर भारी पड़ी। कुछ राज्यों में बड़े नेताओं के अहं का टकराव भी नतीजों पर नकारात्मक असर पड़ा। चुनाव नतीजों से साफ है कि 2014 और 2019 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तर प्रदेश में अपने ओबीसी वोट बैंक को सहेजने में विफल रही।
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