होली का खुमार लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। जिस तरह मथुरा के बरसाना और नंदगांव की ‘लट्ठमार होली’ दुनिया भर में मशहूर है। देखा जाए तो होली पर कई परंपराएं अब खत्म हो चली हैं। लेकिन आज भी कुछ ऐसी परंपराएं है जो पिछले 300 सालों से चली आ रही है। होली के मौके पर पिछले 300 साल से भी ज्यादा समय से शाहजहांपुर में 'लाटसाहब का जुलूस' निकाले जाने की परंपरा है।
शाहजहांपुर में लाट साहब के दो जुलूस निकाले जाते
शाहजहांपुर में लाट साहब के दो जुलूस निकाले जाते हैं। जिसको छोटे और बड़े लाट साहब के नाम से जाना जाता है। यहां लोग एक लाट साहब चुनते हैं और उसे खूब शराब पिलाते हैं और फिर शहर में उसका जुलूस निकाल उसपर जूते-गोबर फेंके जाते हैं। जुलूस में एक शख्स को लाट साहब बनाकर भैंसा गाड़ी पर बैठाया जाता है और फिर उसे जूते और झाड़ू मार कर पूरे शहर में घुमाया जाता है। इस दौरान आम लोग भी लाट साहब को जूते मारते हैं। और कोतवाल सलाम ठोकते है और नेग देते है। लाट साहब पर अबीर-गुलाल के साथ जूते-चप्पल भी फेंके जाते हैं। वहीं दोनों जुलूसों के रूट के 67 मस्जिद और मजारों को तिरपाल से ढक दिया जाता है, ताकि इस दौरान धार्मिक स्थल पर रंग फेंक कर कोई माहौल को न बिगाड़ सके।
ये परंपरा अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही
दरअसल अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश का इजहार करने के लिए लाट साहब को जूता-झाड़ू मारने की परंपरा की शुरुआत हुई थी। तब गधे पर लाट साहब को बैठाकर रंग खेलते हुए घुमाया जाता था, फिर उन्हें हाथी पर बैठाकर घुमाए जाने लगा। अब लाट साहब को भैंसा गाड़ी पर बैठा कर शहर का चक्कर लगवाया जाता है। एक वक्त हिंदू और मुसलमान मिलकर इसे उत्साह के साथ मनाते थे। हालांकि बाद में इसे लेकर विवाद होने लगा। लाट साहब का जुलूस बेहद संवेदनशील माना जाता है। इस कारण कुछ धार्मिक स्थलों को तिरपालों से ढक दिया जाता है।
अब्दुल्ला खां ने की थी नवाब के जुलूस की शुरूआत
जानकारों का कहना है कि अब्दुल्ला खां ने 1746-47 में शुरू की थी। किले पर फिर से कब्जा करने के बाद इसकी शुरुआत की गई थी। उन्होंने किला मोहल्ला में एक रंग महल बनवाया था, अब उसे रंग मोहल्ला बोलते है। अब्दुल्ला खां वहां पर आकर हर साल होली खेलते थे, तब जुलूस निकाला जाता था। जिसमें हाथी-घोड़े होते थे, बैंड बाजा का इंतजाम रहता था। बाद में अब्दुल्ला की मौत हो गई, लेकिन उनके ना रहने के बाद भी लोगों ने जुलूस निकालना बंद नहीं किया। भारत में अंग्रेजों का शासन आया और होली पर नवाब का जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन लोगों ने जुलूस निकालना बंद नहीं किया, बस उसके तरीके बदल दिए गए। पहले जो जुलूस उत्सव के रूप में निकाला जाता था, अब उसे अंग्रेजों के विरोध में निकाला जाने लगा। इसका नाम नवाब साहब के जुलूस की जगह लाट साहब का जुलूस कर दिया गया। अंग्रेजों का भारत के लोगों पर बहुत जुल्म था। यही वजह है कि 1947 के बाद से इस जूलूस में हुड़दंगई शामिल हो गई। अंग्रेजों पर गुस्सा निकालने के लिए लोग कुछ तरह तरह के तरीके अपनाने लगे।
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