गौतमबुद्ध नगर की थाना साइबर क्राइम पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है. पुलिस ने 'डिजिटल अरेस्ट' के मामले में एक अभियुक्त को धर दबोचा है. दरअसल 26 जून को सेक्टर-45 नोएडा द्वारा थाना साइबर क्राइम में पीड़ित ने लिखित शिकायत दर्ज कराई. पीड़िता की शिकायत के अनुसार 23 जून को उनके मोबाइल पर एक अज्ञात व्यक्ति का फोन आया. आरोपी ने खुद को फेडेक्स कोरियर कंपनी का कर्मचारी बताया साथ ही कहा कि आधार कार्ड व क्रेडिट कार्ड की आईडी से विदेश भेजे जाने वाले पार्सल में अवैध MDMA मादक पदार्थ, फर्जी पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड मिले हैं. जिसका प्रयोग मनी लान्ड्रिग के केस में हो रहा था और इस मामले की जांच मुम्बई क्राईम ब्रान्च व CBI अधिकारी द्वारा किये जाने का भय दिखाकर जांच के नाम पर पीड़िता को 23 जून से लेकर 25 जून तक 'डिजिटल अरेस्ट' कर उसके बैंक खाते से 84,16,979 रूपये कई खातों में ट्रांसफर करा लिए.
पीड़िता के खाते से 5 लाख रुपये आरोपी को हुए ट्रांसफर
साइबर क्राइम पुलिस ने जब मामले की जांच की तो पता चला कि पीड़िता के बैंक खातों से 84 लाख रुपये कई अन्य बैंक खातों में ट्रान्सफर कराए गए हैं. इसी क्रम में एक बैंक खाता (सिटी यूनियन बैंक) जिसका खाताधारक अभियुक्त उमेश महाजन है. जो दिल्ली के राजौरी गार्डन मे रहता है उसके सिटी यूनियन बैंक खाते में पीड़िता के बैंक खाते से 5 लाख 110 रुपए ट्रांसफर हुए हैं. जिसके बाद आरोपी उमेश महाजन के बारे में जानकारी जुटाई गई. जिसके बाद आरोपी को 31 जुलाई को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया है. अभियुक्त के कब्जे से घटना में प्रयुक्त 1 मोबाइल फोन भी बरामद किया गया है.
बैंक खाते की जानकारी देने पर मिलते थे 30 हजार रुपये
वहीं पुलिस पूछताछ के दौरान आरोपी ने बताया कि उसने सोशल मीडिया में सर्फिंग के दौरान फेसबुक पर एक विज्ञापन देखा. जिसमें पार्ट टाईम जॉब कर पैसा कमाने के बारे में बताया गया था. जिस पर अभियुक्त ने फेसबुक पर उपलब्ध विवरण के आधार पर सियान नाम के व्यक्ति से व्हाट्सएप पर संपर्क किया. जो एक बैंक खाता उपलब्ध कराने पर अभियुक्त को 30,000 रूपये प्रदान करता था, उस व्यक्ति को अभियुक्त उमेश महाजन ने अपना बैंक खाता जिस पर रजिस्टर्ड मो0न0 को हटाकर उसके स्थान पर एक फर्जी सिम लेकर उस एकाउण्ट में रजिस्टर्ड करा दिया गया और उस खाते को बाद में सियान नाम के व्यक्ति को उपलब्ध करा दिया. इस प्रकार उसके द्वारा अपने अन्य साथियों के भी एकाउण्ट खुलावा कर उन पर फर्जी नाम पते से लिये गये. सिम नम्बरों को रजिस्टर्ड कर ओटीपी शेयर कर साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराया गया. जिसके एवज में इसको अलग से पैसा मिलता रहा. इस प्रकार अभियुक्त फर्जी खाते तैयार कर उनका एक्सेस अपने साथियों को देता था और धोखाधड़ी से अर्जित की गयी धनराशि में अपना कमीशन लेता था.
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